सुबह से हल्की हल्की बारिश हो रही है रात जरूर उदास रही होगी मगर थोड़ी उदास , ज़्यादा होती तो टूट के बारिशें आती!
बारिशों ने सारा आकाश धो दिया है हवा में एक नमी सी है ठंडी नमी , जब भी गुज़रती है पास से तो भीतर तक भीगो जाती है , मन जाने कहीं दूर चला गया है , आकाश को देखते हुये देर तक जाने क्या क्या तो याद आता है ( याद एक अमरबेल है ) कहीं तो पढा था पर याद नहीं आ रहा , आकाश बरस रहा और साथ साथ मन भी , भीगते आसमान में गुलमोहर को देखती हूँ सुर्ख़ लाल दहकते हुये फूलों से लदा गुलमोहर । घर जाने वाले रास्ते के मोड़ पर सदा हँसता हुआ मिलता था मोहल्ले के बच्चे उसके आगे पीछे ऊपर नीचे लदे रहते थे एक पल के लिये भी उसे अकेला नही छोड़ते ,वो कभी बुरा भी नही मानता इस न छोड़े जाने वाली बात का ,मानो वे उसके अकेलापन के सबसे प्यारे साथी हो जिन्हें कोई छोड़ना नहीं चाहता । अक्सर उससे दूर जाते मुड़ कर एक नज़र देख लेती थी और वो मुस्कुरा कर कहता चेतना पारिख कैसी हो ..अनायास ही हँसी आ जाती और देर तक सोचती कि इसे कैसे पता मेरी पसंदीदा कविता के बारे में । उसे कभी उदास नहीं देखा हमेशा खिला और मुस्कुराता हुआ , हवा चलती तो और बिखर जाता , झूम झूम के अपनी ही भाषा का कोई गीत गाता ( पेड़ पौधों की भी अपनी कोई न कोई भाषा जरूर होगी जिसमें वे एक दूसरे से बात करते होगे , दुख सुख बतियाते होगें )। , हमेशा मुस्कुराने वालों के भीतरी दुख और गहरे होते हैं पर वे ज़ाहिर नहीं करते , भीतर ही भीतर सोख लेते हैं वे अपने दुखों को , आज भीगे बादलों में भीगा गुलमोहर याद आ रहा , पानी की बूँदों में डूबा , उसका हरापन और निखर जाता , दुख जितना भीगता है उतना ही हरा होता जाता है , सच बारिशों के मौसम में वो कितना रोता होगा .....कोई देख न पाये इसलिये उसने बारिशें चुनी ......हम कभी क्यों नहीं देख पाये बारिश में भीगते उसके मन को .....
(फोटो ..दिल्ली एन आई आई कैम्पस की )
